लेखक: मौलाना तक़ी अब्बास रिज़वी कलकत्तावि
हौज़ा न्यूज़ एजेंसी! इंसानी ज़िंदगी हर दौर में नये मसाइल, बदलते हुए हालात और मुख़्तलिफ़ चुनौतियों से दोचार रही है, लेकिन आज के दौर की सूरत-ए-हाल इस लिहाज़ से कहीं ज़्यादा पेचीदा है कि इंसान को एक साथ दीनी, फ़िक्री, अख़लाक़ी, मुआशरती, सियासी, मआशी और तहज़ीबी मसाइल का सामना है। साइंस और टेक्नोलॉजी की तेज़ रफ़्तार तरक़्क़ी, मालूमात के बेहिसाब ज़राए, बदलते हुए मुआशरती रुझान और मुख़्तलिफ़ फ़िक्री व नज़रियाती तहरीकों ने जहाँ ज़िंदगी के बहुत से मसाइल को आसान बनाया है, वहीं सही और ग़लत, हक़ और बातिल, हलाल और हराम तथा दीनी क़दरों और ग़ैर-दीनी तहज़ीबी तसव्वुरात के बीच फ़र्क़ करना भी मुश्किल बना दिया है।
ख़ुसूसन नयी नस्ल एक ऐसे माहौल में परवान चढ़ रही है जहाँ हर तरह का नज़रिया, हर क़िस्म की फ़िक्र और हर दावा चंद लम्हों में उस तक पहुँच जाता है। सोशल मीडिया, आधुनिक इबलाग़ी ज़राए और आलमी तहज़ीबी असरात ने दुनिया को एक-दूसरे के क़रीब ज़रूर कर दिया है, लेकिन इसके साथ फ़िक्री इज़्तिराब, शुबहात, इल्हादी अफ़्कार, मज़हबी बे-एतिनाई, अख़लाक़ी इनहिटात और दीनी शनाख़्त के बोहरान जैसे मसाइल भी शिद्दत इख़्तियार कर गए हैं। ऐसे हालात में सिर्फ़ जज़्बात या रिवायती वाबस्तगी काफ़ी नहीं; बल्कि सही इल्म, बसीरत, मोतबर दीनी रहनुमाई और मज़बूत फ़िक्री बुनियाद पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरी है।
दूसरी तरफ़ रोज़मर्रा की ज़िंदगी भी नये-नये मसाइल से भरी हुई है। इबादात और मुआमलात से लेकर ख़ानदानी ज़िंदगी, तिजारत, मआशियत, आधुनिक टेक्नोलॉजी, तिब्ब, मुआशरत, तालीम और इज्तिमाई उमूर तक ऐसे बेशुमार सवालात सामने आते रहते हैं जिनके लिए क़ुरआन व सुन्नत, अहादीसे अहले बैत (अ) और फ़िक़्ही उसूलों की गहरी मआरिफ़त ज़रूरी है। हर शख़्स इन मसाइल का माहिर नहीं हो सकता और न ही महज़ ज़ाती राय या इंटरनेट पर मौजूद मालूमात को दीनी हुज्जत क़रार दिया जा सकता है। यही वह मुक़ाम है जहाँ उलमा, फ़ुक़हा और मराजेअ-ए-किराम की अहमियत पूरी तरह सामने आती है।
रसूले अकरम (स) का मशहूर इरशाद है:
«إِنَّ الْعُلَمَاءَ وَرَثَةُ الْأَنْبِيَاءِ، إِنَّ الْأَنْبِيَاءَ لَمْ يُوَرِّثُوا دِينَاراً وَلَا دِرْهَماً، إِنَّمَا وَرَّثُوا الْعِلْمَ، فَمَنْ أَخَذَهُ أَخَذَ بِحَظٍّ وَافِرٍ»
“बेशक उलमा अम्बिया के वारिस हैं; अम्बिया ने न दीनार विरसे में छोड़े और न दिरहम, बल्कि उन्होंने इल्म विरसे में छोड़ा; पस जिसने उस इल्म को हासिल किया, उसने बहुत बड़ा हिस्सा हासिल कर लिया।”
यह हदीस उलमा की अज़मत सिर्फ़ इसलिए बयान नहीं करती कि वे इल्म रखते हैं, बल्कि उनके रिसालत-ए-हिदायत के सिलसिले को जारी रखने की तरफ़ भी इशारा करती है। अम्बिया (अ) ने इंसानों को तौहीद, मआरिफ़त, अख़लाक़, अहकामे इलाही और हक़ व बातिल की पहचान अता की; उनके बाद यह इल्मी और दीनी अमानत उन अहले-इल्म तक पहुँची जो इख़्लास, तक़वा और बसीरत के साथ दीन की हिफ़ाज़त और लोगों की रहनुमाई का फ़रीज़ा अंजाम देते हैं।
अलबत्ता यहाँ “उलमा” से मुराद महज़ मालूमात रखने वाले अफ़राद नहीं, बल्कि वे अहले-इल्म हैं जो मआरिफ़े इलाही, अहकामे दीन और मकतबे अहले बैत (अ) की गहरी मआरिफ़त रखते हों, इल्म के साथ अमल और तक़वा से आरास्ता हों और दीन को सही तौर पर समझने और उसकी सही तर्जुमानी करने की सलाहियत रखते हों। क्योंकि अगर इल्म किरदार, तक़वा और ज़िम्मेदारी से अलग हो जाए तो वह इंसान की हिदायत के बजाय कभी-कभी गुमराही का ज़रिया भी बन सकता है।
आज जब एक तरफ़ मुख़्तलिफ़ फ़िक्री और तहज़ीबी नज़रियात हमारी नयी नस्ल के ज़ेहनों को मुतास्सिर कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ़ इस्लाम और मकतबे अहले बैत (अ) के ख़िलाफ़ मुख़्तलिफ़ सतहों पर शुबहात, एतराज़ात और प्रोपेगैंडा भी सामने आते रहते हैं, ऐसे माहौल में उलमा और मराजेअ-ए-किराम की ज़िम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। उन्हें सिर्फ़ रिवायती मसाइल के जवाब देने तक महदूद नहीं रहना, बल्कि दीन की सही मआरिफ़त, फ़िक्री शुबहात के इज़ाले, नयी नस्ल की तरबियत, अख़लाक़ी क़दरों की हिफ़ाज़त, इस्लामी तहज़ीब की पासदारी और बदलते हुए हालात में अहकामे इलाही की सही रहनुमाई भी फ़राहम करनी है।
इसी तरह उम्मत की भी ज़िम्मेदारी है कि वह हर आवाज़ को दीनी रहनुमाई का मयार न बनाए, बल्कि अहले-इल्म और अहले-तक़वा की तरफ़ रुजूअ करे, उनकी इल्मी रहनुमाई से इस्तिफ़ादा करे और दीन को अपनी ख़्वाहिशात, ग़ैर-मोतबर मालूमात या सतही जज़्बात के बजाय क़ुरआन, सुन्नते रसूल (स), तालीमाते अहले बैत (अ) और मोतबर फ़िक़्ही रहनुमाई की रोशनी में समझे।
यही मफ़हूम दौर-ए-ग़ैबत में और भी ज़्यादा अहमियत इख़्तियार कर जाता है। जब इमामे ज़माना (अज) पर्दए ग़ैबत में हैं और हर शख़्स सीधे इमाम की ख़िदमत में हाज़िर होकर अपने मसाइल का जवाब हासिल नहीं कर सकता, तो दीनी रहनुमाई का मोतबर रास्ता क्या है? हमारी ज़िम्मेदारी क्या है? और किन अहले-इल्म की तरफ़ रुजूअ किया जाए?
इसी बुनियादी सवाल के जवाब में इमामे ज़माना (अज) की वह मशहूर तौक़ीअ हमारे सामने आती है:
«أَمَّا الْحَوَادِثُ الْوَاقِعَةُ فَارْجِعُوا فِيهَا إِلَى رُوَاةِ حَدِيثِنَا، فَإِنَّهُمْ حُجَّتِي عَلَيْكُمْ وَأَنَا حُجَّةُ اللَّهِ عَلَيْهِمْ»
“और जो नये पेश आने वाले हादिसात और वाक़िआत हों, उनमें हमारे अहादीस के रावियों की तरफ़ रुजूअ करो; क्योंकि वे तुम पर मेरी हुज्जत हैं और मैं उन पर अल्लाह की हुज्जत हूँ।”
यह मुख़्तसर मगर अज़ीम फ़रमान दौर-ए-ग़ैबत में दीनी रहनुमाई के एक बुनियादी उसूल की वज़ाहत करता है। इसमें सिर्फ़ फ़िक़्ही मसाइल के जवाब का रास्ता नहीं बताया गया, बल्कि इल्म, फ़क़ाहत, दीनी बसीरत और मोतबर रहनुमाई से वाबस्तगी की एक ऐसी बुनियाद फ़राहम की गई है जो आज के पेचीदा दौर में पहले से कहीं ज़्यादा अहम है।
लिहाज़ा दौर-ए-ग़ैबत में हमारी ज़िम्मेदारी सिर्फ़ इमामे ज़माना (अज) के ज़ुहूर की दुआ करना नहीं, बल्कि इमाम की मआरिफ़त, दीन की सही समझ, मोतबर उलमा व फ़ुक़हा से वाबस्तगी, अहकामे इलाही पर अमल, अपने किरदार की इस्लाह और मुआशरे को ख़ैर व सलाह की तरफ़ ले जाने की अमली कोशिश भी है।
इसी तनाज़ुर में तौक़ीए-इमामे ज़माना (अज) के यह अल्फ़ाज़ “فَإِنَّهُمْ حُجَّتِي عَلَيْكُمْ” — “वे तुम पर मेरी हुज्जत हैं” समझना निहायत ज़रूरी है; क्योंकि इसमें दौर-ए-ग़ैबत में उलमा व फ़ुक़हा की इल्मी व दीनी ज़िम्मेदारी और अहले ईमान के उनकी तरफ़ रुजूअ करने के उसूल की एक बुनियादी रहनुमाई मौजूद है।
ग़ैबत का दौर सिर्फ़ इंतज़ार, दुआ और ज़िक्र का दौर नहीं, बल्कि मआरिफ़त, इताअत, दीनी बसीरत, सही रहनुमाई और अमली ज़िम्मेदारी का दौर है। सवाल यह है कि जब इमामे ज़माना (अज) तक सीधे पहुँचना संभव न हो, तो दीन से जुड़े मामलों, सामाजिक मसाइल और नये पेश आने वाले हालात में हमारी रहनुमाई का ज़रिया क्या हो?
इसी सवाल का जवाब इमामे ज़माना (अज) की उस मशहूर तौक़ीअ में मिलता है, जिसमें फ़रमाया गया:
أَمَّا الْحَوَادِثُ الْوَاقِعَةُ فَارْجِعُوا فِيهَا إِلَى رُوَاةِ حَدِيثِنَا، فَإِنَّهُمْ حُجَّتِي عَلَيْكُمْ وَأَنَا حُجَّةُ اللَّهِ عَلَيْهِمْ۔
“और जो नये पेश आने वाले हादिसात और वाक़िआत हों, उनमें हमारे अहादीस के रावियों की तरफ़ रुजूअ करो; क्योंकि वे तुम पर मेरी हुज्जत हैं और मैं उन पर अल्लाह की हुज्जत हूँ।”
यह तौक़ीअ इमामे ज़माना (अज) की तरफ़ से इश्हाक़ बिन याक़ूब के सवालों के जवाब में जारी हुई। उन्होंने अपने सवालात लिखकर हज़रत के ख़ास नायब मुहम्मद बिन उस्मान अमरी के ज़रिये इमाम तक पहुँचाए और उनका जवाब हासिल किया।
यह फ़रमान दौर-ए-ग़ैबत में दीनी रहनुमाई और हमारी ज़िम्मेदारी का एक बुनियादी उसूल पेश करता है।
तौक़ीअ का पस-ए-मंज़र
इश्हाक़ बिन याक़ूब ने कई दीनी और अमली मसाइल के बारे में इमामे ज़माना (अज) से सवाल किया। इन सवालों के जवाब में इमाम (अज) ने एक आम और बुनियादी रहनुमाई फ़रमाई कि जब नये हालात और हादिसात पेश आएँ तो हमारे अहादीस के रावियों की तरफ़ रुजूअ करो।
इसका मतलब यह नहीं कि इंसान अपनी ख़्वाहिश, ज़ाती राय या हर ग़ैर-मुअतबर ज़रिये को दीन का पैमाना बना ले, बल्कि उसे उन लोगों की तरफ़ रुजूअ करना चाहिए जो क़ुरआन, हदीस, शरीअत और अहले बैत (अ) की तालीमात के माहिर हों।
रुवाते हदीस से मुराद कौन हैं?
यहाँ एक अहम सवाल पैदा होता है कि “रुवाते हदीस” से क्या सिर्फ़ वे लोग मुराद हैं जो हदीसें बयान करते हैं और उन्हें दूसरों तक पहुँचाते हैं?
हरगिज़ नहीं।
सिर्फ़ हदीस को याद कर लेना या उसे बयान कर देना काफ़ी नहीं है। एक दीनी आलिम के लिए यह ज़रूरी है कि वह हदीस के मअनी को समझे, मुख़्तलिफ़ रिवायतों के बीच तालमेल पैदा करे, सही और ग़ैर-मुअतबर रिवायत में फ़र्क़ करे और उनसे अमली हुक्म हासिल करने की सलाहियत रखता हो।
उसे आम और ख़ास, मुहकम और मुतशाबेह, मुतलक़ और मुक़य्यद तथा मुख़्तलिफ़ क़ुरआनी और हदीसी दलालतों को समझने की सलाहियत भी होनी चाहिए।
इसलिए “रुवाते हदीस” से मुराद सिर्फ़ हदीस के नाक़िल नहीं, बल्कि साहिबे फ़हम, साहिबे नज़र, अहले इस्तिनबात उलमा और फ़ुक़हा हैं।
अगर सिर्फ़ हदीस बयान करना ही काफ़ी होता तो इल्मे फ़िक़्ह, उसूले फ़िक़्ह, इल्मे रजाल और दिरायत जैसे उलूम की ज़रूरत ही पेश न आती।
दौर-ए-ग़ैबत में फ़ुक़हा की तरफ़ रुजूअ
इमामे ज़माना (अज) की तरफ़ से फ़ुक़हा की तरफ़ रुजूअ सिर्फ़ एक वैकल्पिक इल्मी मशवरा नहीं, बल्कि इमाम की हिदायत के मुताबिक़ एक दीनी ज़िम्मेदारी है।
इसलिए मुसलमान को चाहिए कि वह अपनी ख़्वाहिश को हलाल और हराम का पैमाना न बनाए, बल्कि दीन के मसाइल में उन अहले-इल्म की तरफ़ रुजूअ करे जो इल्म, तक़वा, अमानत और फ़िक़्ही सलाहियत रखते हों।
हवादिसे वाक़ेआ का मतलब
अगर “हवादिसे वाक़ेआ” से सिर्फ़ नये फ़िक़्ही मसाइल मुराद लिये जाएँ तो इस तौक़ीअ का दायरा बहुत महदूद हो जाएगा।
इमाम ख़ुमैनी ने विलायते फ़क़ीह की बहस में इस पहलू पर तफ़सील से गुफ़्तगू की है। उनके मुताबिक़ इश्हाक़ बिन याक़ूब पहले से यह जानता था कि दीनी मसाइल में फ़ुक़हा की तरफ़ रुजूअ किया जाता है; इसलिए “हवादिसे वाक़ेआ” का मतलब सिर्फ़ फ़िक़्ही मसाइल नहीं, बल्कि वे तमाम नये हालात, सामाजिक मुश्किलात और ऐसे मामले भी हो सकते हैं जिनमें मुसलमानों की दीनी रहनुमाई और फ़ैसले की ज़रूरत हो।
इमाम ख़ुमैनी ने इस सिलसिले में मौसूअतुल इमाम ख़ुमैनी, जिल्द 21, विलायते फ़क़ीह, सफ़्हात 83 से 88 में इस तौक़ीअ से इस्तिदलाल किया है।
इस नज़रिये के मुताबिक़ ग़ैबत के दौर में इमाम ने उम्मत को बे-रहनुमा नहीं छोड़ा, बल्कि दीन से वाक़िफ़ और अहले-फ़िक़्ह की तरफ़ रुजूअ का रास्ता बताया।
“فَإِنَّهُمْ حُجَّتِي عَلَيْكُمْ” — एक अज़ीम ऐलान
तौक़ीअ का सबसे अहम और गहरा हिस्सा यह है:
“फ़इन्नहुम हुज्जती अलैकुम” — “वे तुम पर मेरी हुज्जत हैं।”
यहाँ “हुज्जत” का मतलब सिर्फ़ यह नहीं कि फ़ुक़हा हदीस बयान करने वाले लोग हैं, बल्कि यह एक बड़ी दीनी ज़िम्मेदारी और मरजइयत की तरफ़ इशारा करता है।
इमाम ख़ुमैनी के इस्तिदलाल के मुताबिक़ जब कोई शख़्स अल्लाह की तरफ़ से या अल्लाह की हुज्जत की तरफ़ से हुज्जत क़रार दिया जाए, तो उसके लिए एक व्यापक दीनी ज़िम्मेदारी और रहनुमाई का पहलू पैदा होता है।
अम्बिया और आइम्मा (अ) अल्लाह की हुज्जत इसलिए हैं कि लोग उनके सामने अपनी ज़िम्मेदारी से बे-ख़बर न रह सकें।
इमामे ज़माना (अज) फ़रमाते हैं कि फ़ुक़हा लोगों पर मेरी हुज्जत हैं और मैं उन पर अल्लाह की हुज्जत हूँ।
हुज्जत होने का मतलब क्या है?
हुज्जत उस शख़्स को कहा जाता है जो दीनी ज़िम्मेदारी के साथ रहनुमाई का ज़रिया हो और जिसकी हिदायत के सामने इंसान के पास अपनी ज़िम्मेदारी से बचने का बहाना न रहे।
अगर कोई शख़्स जान-बूझकर सही दीनी रहनुमाई की मुख़ालिफ़त करता है तो उस पर हुज्जत क़ायम हो जाती है।
इमाम ख़ुमैनी ने फ़ुक़हा की ज़िम्मेदारी को सिर्फ़ फ़तवा देने तक महदूद नहीं रखा, बल्कि उसे मुसलमानों के सामूहिक मामलों और इस्लामी समाज की ज़िम्मेदारियों से भी जोड़ा है।
फ़ुक़हा — सिर्फ़ मसाइल बताने वाले नहीं
तौक़ीअ में फ़ुक़हा की तरफ़ रुजूअ का हुक्म इस बात की तरफ़ रहनुमाई करता है कि वे सिर्फ़ मसाइल बयान करने वाले लोग नहीं, बल्कि दीन के समझदार और ज़िम्मेदार रहनुमा हैं।
इमाम ख़ुमैनी ने इसी उसूल की बुनियाद पर विलायते फ़क़ीह और इस्लामी हुकूमत की एक व्यापक फ़िक़्ही तशरीह पेश की।
यहाँ यह बात भी ज़रूरी है कि तौक़ीअ का मूल वाक्य “रुवाते हदीस” की तरफ़ रुजूअ का हुक्म देता है, जबकि फ़ुक़हा की व्यापक सामाजिक और सियासी विलायत की तफ़सील इमाम ख़ुमैनी की फ़िक़्ही तशरीह और दूसरे दलाइल के साथ मिलकर सामने आती है।
हज़रत अली (अ) की हुकूमत — एक अमली मिसाल
इमाम ख़ुमैनी ने हज़रत अली (अ) की हुकूमत को एक अमली मिसाल के तौर पर पेश किया है।
हज़रत अली (अ) की हुकूमत का दायरा इराक़, मिस्र, हिजाज़ और ईरान के बड़े हिस्सों तक फैला हुआ था, लेकिन उस हुकूमत की पहचान शाही ठाठ-बाट, ऐश-ओ-इशरत और बैतुलमाल के ग़लत इस्तेमाल से नहीं थी।
मस्जिद सिर्फ़ इबादत की जगह नहीं थी, बल्कि सामाजिक और हुकूमती ज़िम्मेदारियों का भी अहम मरकज़ थी। वहीं से फ़ैसले होते, वहीं लोगों के मसाइल सुने जाते और वहीं से समाज की रहनुमाई होती।
इससे यह सबक़ मिलता है कि हुकूमत की असली क़ीमत उसकी शान-ओ-शौकत नहीं, बल्कि अद्ल, अमानत, ख़िदमत और इस्लामी ज़िम्मेदारी है।
“وَأَنَا حُجَّةُ اللَّهِ عَلَيْهِمْ”
तौक़ीअ का अगला हिस्सा है:
“और मैं उन पर अल्लाह की हुज्जत हूँ।”
यानी रहनुमाई का यह सिलसिला यूँ समझा जा सकता है:
अल्लाह → इमाम (अ) → फ़ुक़हा → मोमिनीन
ग़ैबत का मतलब यह नहीं कि इंसान को दीन की रहनुमाई से महरूम छोड़ दिया गया है। बल्कि ग़ैबत के दौर में क़ुरआन, अहले बैत (अ) की तालीमात, सही फ़िक़्ह और भरोसेमंद उलमा से वाबस्ता रहना और भी ज़रूरी हो जाता है।
इसलिए अपनी ख़्वाहिश को दीन का पैमाना बनाने के बजाय इल्म और भरोसेमंद दीनी रहनुमाई से जुड़ना चाहिए।
फ़ुक़हा का इमामे ज़माना (अज) से ताल्लुक़
यहाँ एक अहम सवाल पैदा होता है कि फ़ुक़हा का इमामे ज़माना (अज) से क्या ताल्लुक़ है? क्या हर फ़क़ीह का इमाम से ख़ास और सीधे तौर पर कोई रिश्ता होता है? क्या फ़ुक़हा की तरफ़ रुजूअ इसलिए किया जाता है कि वे इमाम से मुलाक़ात करते हैं?
इस सवाल को समझने के लिए ग़ैबते सुग़रा और ग़ैबते कुबरा के फ़र्क़ को समझना ज़रूरी है।
ग़ैबते सुग़रा का दौर मुक़ाबलतन छोटा था। आम लोग इमाम (अज) को नहीं देखते थे, लेकिन कुछ ख़ास और मुन्तख़ब अफ़राद इमाम की ख़िदमत में हाज़िर होते थे और यह सिलसिला इमाम के ख़ास नायबों के ज़रिये चलता था।
इमाम के चार मशहूर ख़ास नायब थे, जिनका इमाम से सीधा और ख़ास ताल्लुक़ था।
लेकिन ग़ैबते कुबरा के शुरू होने के बाद यह ख़ास और आम तौर पर जारी रहने वाला सीधा राब्ता ख़त्म हो गया। अब कोई शख़्स यह दावा नहीं कर सकता कि वह इमाम का ख़ास तौर पर मुक़र्रर किया हुआ नायब है या उसे इमाम तक रोज़मर्रा का ख़ास और यक़ीनी रसाई हासिल है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि शिया उम्मत को बग़ैर रहनुमाई के छोड़ दिया गया। बल्कि इमाम (अज) ने ख़ुद फ़रमाया:
“हमारी हदीसों के रावियों की तरफ़ रुजूअ करो।”
क्या फ़ुक़हा का इमामे ज़माना (अज) से ख़ास राब्ता होता है?
यह मुमकिन है कि नेक और परहेज़गार फ़ुक़हा में से कुछ को इमामे ज़माना (अज) की ज़ियारत और मुलाक़ात का शरफ़ हासिल हुआ हो।
मुक़द्दस अरदबेली, अल्लामा बह्रुल उलूम और दूसरे बुज़ुर्ग उलमा के बारे में ऐसी रिवायतें और वाक़िआत मिलते हैं जिनमें इमामे ज़माना (अज) से मुलाक़ात का ज़िक्र किया गया है।
लेकिन फ़ुक़हा की तरफ़ रुजूअ का असल मापदंड यह नहीं कि उन्होंने इमाम से मुलाक़ात की है या नहीं।
हमारे लिए यह ज़रूरी नहीं कि हमें यह मालूम हो कि थिक़तुल इस्लाम कुलैनी की इमामे ज़माना (अज) से मुलाक़ात हुई थी या नहीं, या शैख़ सदूक़ ने इमाम को जागती हालत में देखा था या नहीं।
इसके बावजूद उनकी किताबें शिया इल्म और फ़िक़्ह के बुनियादी और पहली दर्जे के माख़ज़ में शुमार होती हैं और फ़ुक़हा व मुहक़्क़िक़ीन उनसे इस्तिफ़ादा करते हैं।
इसलिए फ़ुक़हा की तरफ़ रुजूअ का असल मापदंड इमाम से मुलाक़ात नहीं, बल्कि अहले बैत (अ) की तालीमात से गहरा इल्मी ताल्लुक़, फ़िक़्ही सलाहियत, तक़वा, परहेज़गारी और दीनी भरोसा है।
इमामे ज़माना (अज) से फ़िक्री और मकतबी ताल्लुक़
इमामे ज़माना (अज) से हमारा असल और बुनियादी ताल्लुक़ फ़िक्री, इल्मी और मकतबी ताल्लुक़ है।
हम इमाम और अहले बैत (अ) की तालीमात को उनकी रिवायतों और अहादीस के ज़रिये पहचानते हैं। जितना इंसान अहादीस और अहले बैत (अ) की तालीमात में गहरी रिसर्च करता है, उतना ही वह उनके मकतब की रूह और उनकी तालीमात से क़रीब होता जाता है।
तारीख़ में ऐसे बहुत से वाक़िआत मिलते हैं कि आइम्मा (अ) ने मुख़लिस फ़ुक़हा और रावियाने हदीस की हौसला-अफ़ज़ाई फ़रमाई।
इसलिए इमामे ज़माना (अज) से असली क़ुर्बत सिर्फ़ किसी करामाती मुलाक़ात के दावे का नाम नहीं, बल्कि इमाम के मकतब, उनकी सोच, उनकी तालीमात और उनकी दीनी रविश से गहरे ताल्लुक़ का नाम है।
एक तारीख़ी हिकायत
हाजी नूरी ने अल्लामा हिल्ली के बारे में एक हिकायत नक़्ल की है।
कहा जाता है कि एक ग़ैर-शिया आलिम, जो कुछ उलूम में अल्लामा हिल्ली का उस्ताद भी था, ने मज़हबे इमामिया के ख़िलाफ़ एक किताब लिखी। वह उसे लोगों के सामने पढ़ता था, लेकिन उसे डर था कि अगर शिया उलमा को इसकी ख़बर हुई तो वे इसका जवाब देंगे।
अल्लामा हिल्ली ने अपने उस्ताद और शागिर्द के ताल्लुक़ की वजह से वह किताब एक रात के लिए उनसे माँग ली।
रात को किताब की नक़्ल करते हुए आधी रात गुज़र गई और अल्लामा हिल्ली पर नींद ग़ालिब आ गई।
रिवायत में आता है कि साहिबुल-अम्र (अज) तशरीफ़ लाए और फ़रमाया:
“किताब मुझे दे दो और तुम सो जाओ।”
अल्लामा हिल्ली के सो जाने के बाद, रिवायत के मुताबिक़ इमाम (अज) की करामत से किताब की नक़्ल मुकम्मल हो गई।
ऐसे वाक़िआत को अगर रिवायत के तौर पर नक़्ल किया जाए तो इन्हें इमाम की अपने मुख़लिस उलमा पर इनायत और करामत की निशानी समझा जा सकता है; लेकिन फ़ुक़हा की तरफ़ रुजूअ का बुनियादी मापदंड ऐसी मुलाक़ातें नहीं हैं।
असल मापदंड वही है जो ख़ुद इमामे ज़माना (अज) ने फ़रमाया:
“فَارْجِعُوا فِيهَا إِلَى رُوَاةِ حَدِيثِنَا”
यानी हमारे अहादीस के रावियों की तरफ़ रुजूअ करो।
किस फ़क़ीह की तरफ़ रुजूअ किया जाए?
अहले बैत (अ) ने दीनी रहनुमाई के लिए सिर्फ़ इल्म को काफ़ी नहीं समझा, बल्कि इल्म के साथ तक़वा और किरदार को भी ज़रूरी बताया।
रिवायत में फ़रमाया गया है:
“صَائِنًا لِنَفْسِهِ، حَافِظًا لِدِينِهِ، مُخَالِفًا لِهَوَاهُ، مُطِيعًا لِأَمْرِ مَوْلَاهُ”
अर्थ:
“जो अपने नफ़्स को बचाने वाला हो, अपने दीन की हिफ़ाज़त करने वाला हो, अपनी ख़्वाहिशों की मुख़ालिफ़त करने वाला हो और अपने मौला के हुक्म की इताअत करने वाला हो।”
इसलिए हर वह शख़्स जो कुछ दीनी मसाइल बयान कर दे, ज़रूरी नहीं कि वही रुजूअ का मर्कज़ बन जाए।
बल्कि ऐसे आलिम की तलाश ज़रूरी है जिसमें इल्म, तक़वा, इख़्लास, दीनी बसीरत और अहले बैत (अ) की तालीमात से वास्तविक वाबस्तगी मौजूद हो।
इमामे ज़माना (अज) से ताल्लुक़ का हक़ीक़ी मापदंड
इमामे ज़माना (अज) से असली ताल्लुक़ सिर्फ़ यह तलाश करना नहीं कि किसे इमाम से मुलाक़ात हुई और किसे नहीं।
असल सवाल यह है:
क्या हम इमाम के मकतब को जानते हैं?
क्या हम अहले बैत (अ) की तालीमात को समझते हैं?
क्या हम उनके बताए हुए रास्ते पर अपनी ज़िंदगी को ढालने की कोशिश करते हैं?
क्या हमारा किरदार इमाम की रज़ा के मुताबिक़ बनने की कोशिश कर रहा है?
इसलिए दौर-ए-ग़ैबत में सबसे भरोसेमंद रास्ता है:
मआरिफ़त, इल्म, इताअत और अमल।
सनद और दलालत के बारे में एक इल्मी नुक़्ता
इस तौक़ीअ के बारे में इमाम ख़ुमैनी ने इसकी दलालत और मफ़हूम को बहुत अहमियत दी है, हालांकि इसकी सनद के बारे में इल्मी बहस मौजूद है।
इसलिए किसी रिवायत के बारे में इल्मी तौर पर तीन चीज़ों में फ़र्क़ करना चाहिए:
1. उसकी सनद की बहस,
2. उसके असल मअनी और दलालत,
3. और उससे हासिल किए जाने वाले व्यापक फ़िक़्ही नतीजे।
यह तौक़ीअ अगर अकेली और स्वतंत्र दलील के तौर पर न भी ली जाए, तब भी फ़ुक़हा की तरफ़ रुजूअ और उनकी दीनी ज़िम्मेदारी के बारे में मौजूद दूसरे दलाइल के साथ मिलकर एक अहम ताईदी दलील के तौर पर पेश की जा सकती है।
तौक़ीअ का जामेअ पैग़ाम
तौक़ीअ का सबसे बुनियादी और अहम पैग़ाम है:
“فَإِنَّهُمْ حُجَّتِي عَلَيْكُمْ”
यानी “वे तुम पर मेरी हुज्जत हैं।”
इमामे ज़माना (अज) ने ग़ैबत के दौर में उम्मत को बग़ैर रहनुमाई के नहीं छोड़ा।
ग़ैबत का मतलब यह नहीं कि हमारी ज़िम्मेदारियाँ ख़त्म हो गईं, बल्कि इसके उलट ग़ैबत का दौर मआरिफ़त, सही दीनी रहनुमाई, इताअत, तक़वा और अमली तैयारी की ज़िम्मेदारी को और बढ़ा देता है।
हमारी अमली ज़िम्मेदारियाँ
दौर-ए-ग़ैबत में हमारी कुछ बुनियादी ज़िम्मेदारियाँ यह हैं:
• दीन और अहले बैत (अ) के मकतब की सही मआरिफ़त हासिल करना।
• शरई मसाइल में जामेउश-शराइत मरजए तक़लीद की तरफ़ रुजूअ करना।
• क़ुरआन और अहले बैत (अ) की तालीमात को अपनी ज़िंदगी में लागू करना।
• अपनी ख़्वाहिश को हलाल और हराम का पैमाना न बनाना।
• भरोसेमंद उलमा और फ़ुक़हा से रहनुमाई हासिल करना।
• ग़ैर-मुअतबर और ग़ैर-माहिर ज़राए से दीनी फ़ैसले हासिल करने से बचना।
• अपने अख़लाक़, किरदार और मुआमलात को बेहतर बनाना।
• अद्ल, अमानत, सच्चाई, ख़िदमत और इंसानी एहतराम को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाना।
• ज़ुहूर के लिए दुआ करने के साथ-साथ अपने आपको उसके लिए तैयार करना।
इंतज़ार सिर्फ़ एक दावा नहीं
हक़ीक़ी इंतज़ार सिर्फ़ यह कहने का नाम नहीं कि:
“अल्लाहुम्मा अज्जिल लिवलिय्यिकल फ़राज।”
बल्कि असली इंतज़ार इंसान के फ़िक्र, अख़लाक़ और अमल में तब्दीली पैदा करता है।
हमें अपने आप से सवाल करना चाहिए:
क्या मेरी इबादत इमामे ज़माना (अज) को पसंद आ सकती है?
क्या मेरे मुआमलात ईमानदारी पर क़ायम हैं?
क्या मेरा अख़लाक़ इस्लामी है?
क्या मैं हक़ के साथ खड़ा होता हूँ?
क्या मैं ज़ुल्म और नाइंसाफ़ी के मुक़ाबले में सही बात का साथ देता हूँ?
क्या मैं दूसरों के हुक़ूक़ का एहतराम करता हूँ?
क्या मैं अपने घर, समाज और माहौल की इस्लाह और ख़िदमत के लिए कुछ करता हूँ?
इंतज़ार का मतलब है कि हम अपने आपको इमाम के ज़ुहूर के लिए तैयार करें।
इसके लिए ज़रूरी है कि हम:
सही इल्म हासिल करें, अपने अक़ीदे को मज़बूत करें, अपने अख़लाक़ को बेहतर बनाएँ, अपने मुआमलात को पाकीज़ा करें और अपने आपको ख़ैर व इस्लाह का ज़रिया बनाएँ।
हक़ीक़ी इंतज़ार के दो बुनियादी सुतून हैं:
मआरिफ़त और अमल
ग़ैबत ज़िम्मेदारियों से फ़रार का दौर नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारी, इल्म, तक़वा और तैयारी का दौर है।
इसलिए दौर-ए-ग़ैबत का सच्चा इंतज़ार यही है कि हम दीन को सही तौर पर समझें, भरोसेमंद दीनी रहनुमाई से जुड़े रहें, अहकामे इलाही पर अमल करें और अपने किरदार व समाज को इस अंदाज़ में सँवारें कि हम इमामे अस्र (अज) के हक़ीक़ी मुंतज़िर कहलाने के मुस्तहिक़ बन सकें।
अहम मसादिर व मराजेअ
1. इब्ने बाबवय्ह, मुहम्मद बिन अली — कमालुद्दीन, जिल्द 1, सफ़्हा 485, हदीस 4।
2. शैख़ तूसी, अबू जाफ़र मुहम्मद बिन हसन — अल-ग़ैबा, सफ़्हा 291, हदीस 247।
3. शैख़ तूसी — अल-इहतिजाज, जिल्द 2, सफ़्हा 284।
4. तबरसी, फ़ज़्ल बिन हसन — इ'लामुल-वरा, जिल्द 2, सफ़्हा 271।
5. इब्ने अबिल-फ़त्ह अल-इरबिली — कशफ़ुल-ग़ुम्मा, जिल्द 3, सफ़्हा 338।
6. रावंदी, इब्ने हिबतुल्लाह — अल-ख़राइज वल-जरा'इह, जिल्द 3, सफ़्हा 1114।
7. अल्लामा मजलिसी, मुहम्मद बाक़िर — बिहारुल-अनवार, जिल्द 53, सफ़्हा 181, हदीस 10।
8. हुर्रे आमिली, मुहम्मद हसन — वसाइलुश-शिया, जिल्द 20, सफ़्हा 140, हदीस 33424।
9. इमाम ख़ुमैनी — मौसूअतुल-इमाम ख़ुमैनी, जिल्द 21, विलायते फ़क़ीह, सफ़्हात 83–88।
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